सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता के सवाल पर अस्तित्व में आई क्षेत्रीय पार्टियों को 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी झटका लगा है. हालात ऐसे बन गए हैं कि ये पार्टियां अपनी राजनीतिक मजबूती के लिए आपसी विलय की वकालत करने लगी है. सवाल यह है कि जिन पार्टियों का कभी शासन में दबदबा था,आज उनका हश्र ऐसा क्यों हो गया?
आरजेडी और कांग्रेस ने तो कई बार विलय को लेकर छोटी पार्टियों को ऑफर किया है. शरद यादव, जीतन राम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा और मुकेश सहनी जैसे नेताओं की पार्टियों पर खास तौर अस्तित्व का सवाल उभर आया है. यह बात बिहार के संदर्भ में जरूर है, लेकिन पूरे देश में कमोबेश (दक्षिण भारत की कुछ बड़ी पार्टियों को छोड़) ऐसे ही हालात बनते जा रहे हैं....
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Bihar

सही बात है
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